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गोदाम भरे, नीति बदली: फोर्टिफाइड चावल की अनिवार्यता पर अस्थायी ब्रेक, मिलर्स को बड़ी राहत

देशभर के सरकारी गोदामों में पिछले वर्षों से जमा फोर्टिफाइड चावल के भारी भंडार के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। शुक्रवार को केंद्र ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत फोर्टिफाइड चावल की सार्वभौमिक आपूर्ति को अस्थायी रूप से बंद करने का निर्णय लिया। यह जानकारी उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय की ओर से सभी राज्यों को भेजे गए पत्र के माध्यम से दी गई है।

पत्र में स्पष्ट किया गया है कि फोर्टिफाइड चावल की आपूर्ति “तब तक रोकी जा रही है, जब तक लाभार्थियों तक पोषक तत्व पहुंचाने के लिए कोई अधिक प्रभावी व्यवस्था नहीं बन जाती।” इस फैसले का सीधा कारण यह बताया गया है कि मौजूदा समय में देश के गोदामों में फोर्टिफाइड चावल और फोर्टिफाइड राइस कर्नेल (FRK) का पर्याप्त—बल्कि जरूरत से ज्यादा—भंडार पहले से मौजूद है।

यह फैसला ऐसे समय आया है, जब बीते तीन महीनों से चावल मिलर्स और केंद्र सरकार के बीच तीखा टकराव चल रहा था। मिलर्स का आरोप था कि फोर्टिफाइड चावल के लिए लागू किए गए कड़े गुणवत्ता मानक जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते। हाल ही में लागू की गई ‘ड्यूल टेस्टिंग प्रोटोकॉल’ व्यवस्था के चलते सैंपल क्लियर होने में लंबा वक्त लग रहा था, जिससे चावल और FRK का ब्लेंडिंग कार्य अटक गया था।

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परिणामस्वरूप, इस सीजन में कस्टम मिलिंग लगभग ठप हो गई थी। तय योजना के अनुसार, इस वर्ष मिल होने वाले कुल चावल का करीब 90 प्रतिशत फोर्टिफाइड रूप में केंद्र को देना था, जबकि केवल 10 प्रतिशत चावल ‘इम्प्रूव्ड राइस’ के रूप में (सीमित टूटन के साथ) स्वीकार किया जाना था। लेकिन प्रक्रियागत अड़चनों ने पूरी आपूर्ति श्रृंखला को जाम कर दिया।

नए सर्कुलर में राज्यों को निर्देश दिया गया है कि जहां FRK निर्माताओं के एम्पैनलमेंट की टेंडर प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है, वहां इसे तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाए। साथ ही, किसी भी राज्य में FRK निर्माताओं का नया एम्पैनलमेंट अब नहीं किया जाएगा। सरकार का कहना है कि यह कदम मौजूदा फोर्टिफाइड चावल और FRK स्टॉक के पूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।

नीतिगत बदलाव को चावल मिलिंग उद्योग के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है। उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि इससे न सिर्फ मिलिंग प्रक्रिया दोबारा गति पकड़ेगी, बल्कि लंबे समय से जारी अनिश्चितता और वित्तीय दबाव भी कुछ हद तक कम होगा। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार आगे पोषण सुरक्षा के लिए कौन-सा वैकल्पिक और प्रभावी मॉडल अपनाती है।

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